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बॉम्बे हाउस का महासंग्राम:कभी रतन टाटा ने दिग्गजों को दी थी शिकस्त; क्या फिर दोहराया जा रहा है वही इतिहास? – Bombay House Battles: How Ratan Tata’s 1990s War Against Group Barons Echoes In Today’s Tata Sons

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टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के इस्तीफे ने टाटा समूह के भीतर चल रहे तनाव को एक बार फिर सबके सामने ला दिया है। चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच गवर्नेंस, उत्तराधिकार और रणनीतिक दिशा को लेकर मतभेदों की खबरों के बीच मुंबई के बॉम्बे हाउस (मुख्यालय) में तीन दशक पहले हुए ऐतिहासिक सत्ता संघर्ष की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं। यह कहानी उस दौर की है, जब रतन टाटा ने समूह के सबसे शक्तिशाली और स्वायत्त क्षत्रपों से लोहा लिया था और पूरे टाटा साम्राज्य का ढांचा हमेशा के लिए बदल दिया था।

जेआरडी टाटा से विरासत में रतन टाटा को क्या मिला था?

साल 1991 में जब रतन टाटा ने जेआरडी टाटा के उत्तराधिकारी के रूप में टाटा संस के चेयरमैन का पद संभाला, तो बाहर से यह बदलाव बेहद शांत दिखा। लेकिन हकीकत में उन्हें एक बिखरा हुआ साम्राज्य मिला था। उस समय टाटा समूह एक केंद्रीय नियंत्रण वाले संगठन के बजाय स्वतंत्र कंपनियों का एक ढीला-ढाला संघ था, जो केवल इतिहास और टाटा नाम से जुड़े थे। प्रमुख कंपनियों के प्रमुखों के पास पूरी स्वायत्तता थी और वे अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र राजाओं की तरह काम कर रहे थे।

कौन थे वे तीन बड़े क्षत्रप जिन्होंने रतन टाटा के सामने चुनौती खड़ी की?

उस दौर के पुराने दिग्गजों में तीन नाम सबसे ऊपर थे- टाटा स्टील (TISCO) के रुसी मोदी, टाटा केमिकल्स के दरबारी सेठ, और इंडियन होटल्स के अजीत केरकर। ये तीनों अधिकारी खुद को टाटा संस का मातहत मानने के बजाय कंपनी का असली संरक्षक मानते थे। रतन टाटा का मानना था कि उदारीकरण के बाद के नए भारत में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकने के लिए टाटा समूह की एक साझा रणनीति और मजबूत केंद्रीय निगरानी होनी चाहिए। लेकिन इन दिग्गजों को अपनी स्वायत्तता छोड़ना मंजूर नहीं था, जिससे बॉम्बे हाउस में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई।

रुसी मोदी और दरबारी सेठ के खिलाफ रतन टाटा ने कौन सा हथियार चलाया?

इस टकराव में सबसे बड़ा हथियार 1992 में टाटा संस द्वारा लागू की गई रिटायरमेंट पॉलिसी बनी, जिसने रतन टाटा को इन शक्तिशाली सत्ता केंद्रों को नियंत्रित करने का कानूनी ढांचा दिया। जमशेदपुर में लोकप्रिय टाटा स्टील के प्रमुख रुसी मोदी ने बिना बोर्ड की मंजूरी के अपने दत्तक पुत्र आदित्य कश्यप को आगे बढ़ाना चाहा। टाटा संस के साथ कड़े टकराव और बदलते समीकरणों के कारण आखिरकार 1993 में मोदी को टाटा स्टील छोड़नी पड़ी।

वहीं, दरबारी सेठ का विरोध थोड़ा शांत था। जब वे रिटायरमेंट की उम्र के करीब पहुंचे, तो उन्होंने अपने बेटे मनु सेठ को टाटा केमिकल्स में आगे बढ़ाने की कोशिश की। रतन टाटा ने कंपनियों के भीतर वंशानुगत सत्ता केंद्रों का कड़ा विरोध किया और मनु सेठ को भी बाहर जाना पड़ा। अजीत केरकर भी वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच के बाद आखिरकार समूह से बाहर हो गए।

इस ऐतिहासिक जीत ने टाटा ग्रुप को हमेशा के लिए कैसे बदल दिया?

रतन टाटा की यह जीत रातों-रात नहीं मिली, बल्कि यह बोर्ड रूम की रणनीतियों, सेवानिवृत्ति नीति और प्रमुख संस्थागत निदेशकों के समर्थन का नतीजा थी। 1990 के दशक के अंत तक अंदरूनी सत्ता संघर्ष पूरी तरह समाप्त हो गया। टाटा संस अब समूह की सभी कंपनियों के फैसलों, नियुक्तियों और ब्रांड संचालन का असली केंद्र बन चुकी थी। इसी सुदृढ़ीकरण के दम पर अगले दशक में टाटा समूह ने बड़े वैश्विक अधिग्रहण किए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।

क्या बॉम्बे हाउस में आज फिर से सुलग रहे हैं पुराने विवाद?

आज जब टाटा ट्रस्ट्स, नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच मतभेदों की खबरें आती हैं, तो यह साफ हो जाता है कि ‘टाटा साम्राज्य पर असल नियंत्रण किसका होगा’- यह सवाल आज भी जिंदा है। भले ही आज के किरदार और माहौल अलग हैं, लेकिन नियंत्रण, उत्तराधिकार और स्वायत्तता को लेकर छिड़ी यह बहस 1990 के दशक के उसी ऐतिहासिक संघर्ष की याद दिलाती है।

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