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‘काम में मतभेद तो होते रहते हैं’:विपक्ष के आरोपों पर चुनाव आयोग की सफाई, कहा- सभी फैसले मिलकर लेते हैं – Election Commission Responds Opposition Charges Says Differences Are Part Of Job Decisions Taken Collectively

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चुनाव आयोग के भीतर मतभेद वाले विपक्ष के आरोपों के बीच आयोग की ओर से सफाई सामने आई है। आयोग से जुड़े सूत्रों ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी के बीच किसी औपचारिक असहमति की बात को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि कामकाज के दौरान अधिकारी अपनी राय और सुझाव रखते हैं, लेकिन इसे आपसी टकराव या औपचारिक असहमति नहीं माना जाना चाहिए। आयोग के मुताबिक एसआईआर समेत उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्त मिलकर लेते हैं।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का विवाद आखिर शुरू कैसे हुआ?

विवाद इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद बढ़ा, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई। ये मामले नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने या जोड़ने और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े दूसरे फैसलों से संबंधित बताए गए। इसके बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को लेकर सवाल उठाए। अब आयोग की ओर से कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियों और सुझावों पर विचार किया गया था और उन्हें औपचारिक असहमति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

तीनों चुनाव आयुक्तों के फैसलों को लेकर क्या सफाई दी गई?

चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक आयोग में किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान अलग-अलग सुझाव और टिप्पणियां सामने आना सामान्य कामकाजी प्रक्रिया का हिस्सा है। अंतिम फैसले सभी सदस्यों की सहमति से लिए जाते हैं। आयोग ने इस दावे को भी खारिज किया कि एसआईआर से जुड़े फैसले किसी एक व्यक्ति ने लिए। आयोग का कहना है कि उसके फैसलों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के भी हस्ताक्षर होते हैं। इसी आधार पर आयोग ने कहा है कि एसआईआर और दूसरे मामलों में उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

विपक्ष दलों ने क्या आरोप लगाए


  • विपक्षी नेताओं ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुआ दावा किया कि आयोग के भीतर ही इस प्रक्रिया को लेकर मतभेद सामने आए हैं। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं।

  • कांग्रेस का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार महत्वपूर्ण फैसलों में अपनी मनमानी कर रहे हैं और दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी सभी सदस्यों के साथ साझा नहीं की गई।

  • कपिल सिब्बल ने एसआईआर के तहत मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने पर भी चिंता जताई है। उसका कहना है कि 13 करोड़ से ज्यादा नाम मसौदा मतदाता सूचियों से हटने और लाखों मतदाताओं को नोटिस दिए जाने से प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं। 

  • अखिलेश यादव ने चुनाव आयुक्तों की कथित 14 आपत्तियों को गंभीर मामला बताया। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। अखिलेश यादव ने इसे लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बताते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए।

  • शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की। राउत ने दावा किया कि चुनाव आयोग के भीतर लिए जा रहे फैसलों और एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने आयोग की कार्यप्रणाली पर भी आपत्ति जताई।

एसआईआर को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हुआ?

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी। इसके बाद यह प्रक्रिया देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंची। इस प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों के मसौदे से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने के कारण एसआईआर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का विषय बन गया। इसी बीच आयोग के दो सदस्यों की ओर से अलग-अलग मुद्दों पर टिप्पणियां किए जाने की बात सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या आयोग के भीतर भी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग राय थी। आयोग अब इसी बात को खारिज कर रहा है कि ये टिप्पणियां औपचारिक असहमति थीं।

 

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