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Military Modernisation:भारत की सैन्य खरीद में टाइम फैक्टर बना सबसे बड़ी चुनौती, जरूरी हैं कड़े-समयबद्ध लक्ष्य – Timelines Critical In Military Modernisation Defence Acquisitions Of India Govt Policy Army Officials Version

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एक तरफ जहां भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की कोशिश कर रहा है, वहीं सैन्य खरीद में होने वाली अत्यधिक देरी देश की सामरिक तैयारी के सामने एक बड़ा संकट बनकर उभर रही है। हाल ही में संसद में पेश की गई विभिन्न समितियों की रिपोर्टों में चिंता जताई गई है कि हथियारों के अधिग्रहण में लगने वाला लंबा समय सैन्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। सरकार ने रक्षा खरीद की रफ्तार बढ़ाई है, स्वदेशी खरीद को प्राथमिकता दी है और रिकॉर्ड संख्या में अनुबंध किए हैं, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि किसी हथियार की कब जरूरत महसूस हुई, कब ऑर्डर दिया गया और हथियार वास्तव में सैनिक के हाथ में कब पहुंचा।

दशकों का इंतजार और पुरानी होती तोपें

रक्षा खरीद में टाइम फैक्टर के चुनौती बनने के कई उदाहरण हाल ही में सामने आए हैं। संसद की लोक लेखा समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में इस पर कड़ी आपत्ति जताई कि सेना को आर्टिलरी गन मिलने में लगभग दो दशक का लंबा समय लग गया। स्वदेशी धनुष तोप परियोजना बुनियादी ढांचे की कमी और तकनीकी विशेषज्ञता में कमी के कारण अपनी तय समयसीमा से बार-बार पिछड़ती रही। इसका सबसे दुखद आयाम यह है कि किसी हथियार प्रणाली के सेना तक पहुंचने पर तकनीक काफी हद तक बदल चुकी होती है।

सख्त डिलीवरी टाइमलाइन जरूरी

हाल ही में संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि बदलती भू-राजनीतिक स्थिति और तेजी से विकसित होती तकनीक के दौर में रक्षा खरीद के लिए सख्त डिलिवरी टाइमलाइन होनी जरूरी है। पैनल ने चेतावनी दी है कि यदि खरीद प्रक्रिया में अत्यधिक देरी होती है, तो अत्याधुनिक कहे जाने वाले हथियार भी शामिल होने से पहले ही पुराने और अप्रसांगिक हो जाते हैं। सैन्य उपकरणों की यही कमी सेनाओं की ऑपरेशनल तैयारियों को कमजोर करती है। समिति ने यह भी कहा कि हाइब्रिड वॉरफेयर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और छठी पीढ़ी के विमानों के दौर में यदि पारंपरिक प्रक्रिया सुस्त बनी रही, तो भारत पिछड़ सकता है।

राफेल में लंबा वक्त

वायुसेना के आधुनिकीकरण की योजनाओं के सामने भी टाइम फैक्टर सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। राफेल, तेजस मार्क 1ए, और स्वदेशी एमका जैसे कार्यक्रम अनिश्चितता और देरी के शिकार हैं। जबकि क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण तेजी से बदल रहा है और दो मोर्चों पर संभावित सैन्य चुनौतियां भी बनी हुई हैं। इन चुनौतियों को देखते हुए वायुसेना को लड़ाकू विमानों की 42 स्क्वॉड्रन की दरकार है। जबकि पुराने विमानों के चरणबद्ध हटने और नए विमानों के शामिल होने में देरी के कारण फिलहाल सिर्फ 29 स्क्वॉड्रन बची हैं। वायुसेना के पास फिलहाल 36 राफेल विमान हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता दिखाई है। लेकिन 114 अतिरिक्त राफेल विमानों का प्रस्ताव रक्षा खरीद परिषद से हरी झंडी मिलने के बाद अभी तक अनुबंध स्तर तक नहीं पहुंचा है। हालांकि हाल ही में फ्रांस ने इस बारे में तकनीकी और वाणिज्यिक प्रस्ताव भारत को सौंपा है। यदि यह सौदा इस साल के अंत तक भी आकार लेता है, तो पहली डिलीवरी 2032 के आसपास शुरू होने की संभावना है। चूंकि इस सौदे के तहत अधिकांश विमानों का निर्माण भारत में होना है, इसलिए लंबी वार्ताओं, प्रोडक्शन लाइन स्थापित करने और तकनीकी हस्तांतरण की पेचीदगियों में वक्त लगेगा। गौरतलब है कि राफेल भी 4.5 पीढ़ी का विमान है, पांचवीं पीढ़ी का नहीं।

तेजस मार्क 1ए और एमका का लंबा सफर

स्वदेशी तेजस मार्क 1ए को वायुसेना की जरूरतों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना गया था। 83 विमानों के शुरुआती ऑर्डर और अतिरिक्त 97 विमानों की योजना का उद्देश्य तेजी से लड़ाकू क्षमता बढ़ाना था। विमान की पहली आपूर्ति फरवरी 2024 में होनी थी, लेकिन इंजन आपूर्ति में देरी और दूसके तकनीकी कारणों से अब तक एक भी विमान नहीं मिल पाया है। तेजस मार्क 1ए कार्यक्रम में देरी पर जून में रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने यहां तक कहा कि एचएएल की ओर से विमानों की आपूर्ति में इतनी बार देरी हो चुकी है कि अब हमने इसका रिकॉर्ड रखना ही छोड़ दिया है। उधर भारत का पांचवीं पीढ़ी का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमका) कार्यक्रम सबसे महत्वाकांक्षी है। लेकिन इसका पहला प्रोटोटाइप इस दशक के अंत तक ही तैयार हो पाएगा। इसके बाद परीक्षण, हथियार एकीकरण और प्रमाणन की लंबी प्रक्रिया होगी। एमका के वायुसेना में शामिल होने की संभावना 2035 के आसपास मानी जा सकती है। पूर्व वायुसेना प्रमुख अरूप राहा ने अमर उजाला से कहा कि एमका में तेजी लाने के लिए पीएमओ को हस्तक्षेप करना चाहिए। ऐसा होने तक अंतरिम उपाय के तौर पर बाहर से लड़ाकू विमान खरीदे जा सकते हैं।

चीन का दबाव

चीन तेजी से पांचवीं पीढ़ी की स्टील्थ फाइटर क्षमता बढ़ा रहा है। रक्षा आकलनों के अनुसार पीएलए वायुसेना के पास जे-20 स्टील्थ लड़ाकू विमानों की संख्या 350 के आसपास या उससे अधिक हो सकती है। साथ ही पाकिस्तान भी चीन के उन्नत जे-35ए विमान हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दोहरे मोर्चे से मिलने वाली इन चुनौतियों के बीच वायुसेना के सामने हवाई श्रेष्ठता बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। रूस लगातार सुखोई-57 के भारत में निर्माण का प्रस्ताव देता रहा है, लेकिन हाल ही में रक्षा सचिव ने किसी भी नए सुखोई वेरिएंट की खरीद पर विचार से इनकार किया है। यानी मौजूदा स्थिति के अनुसार वायुसेना को 2035 तक पांचवीं पीढ़ी के किसी विमान के बगैर राफेल, तेजस मार्क 1ए और सुखोई-30 के उन्नत संस्करणों के सहारे ही काम चलाना होगा।

दिखावा नहीं, दिल से हो काम

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने हाल ही में दो बार कहा कि देरी से मिलने वाली तकनीक का कोई औचित्य नहीं रह जाता। भारत ड्रोन एंड रोबोटिक्स सम्मेलन में सिंह ने दो टूक शब्दों में कहा कि समय पर तकनीक का न मिलना, तकनीक न मिलने के बराबर है। आधुनिक युद्ध के दौर में केवल नई तकनीक खोज लेना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे सही समय पर लैब से निकालकर बड़े पैमाने पर उत्पादन तक लाना जरूरी है। वायुसेना प्रमुख ने चेतावनी दी कि यदि हमें वह तकनीक तब मिले जब दूसरे देश उसका उपयोग कर उससे भी आगे निकल जाएं, तो उस तकनीक का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यदि चीजें प्रासंगिकता की गति के साथ नहीं होंगी, तो हम दुनिया से पिछड़ जाएंगे। वायुसेना प्रमुख ने गीता के श्लोक योगः कर्मसु कौशलम् (किसी कार्य में कुशलता ही योग है) का हवाला देते हुए कहा कि उत्कृष्टता एक बार की गतिविधि नहीं, बल्कि आदत है। उन्होंने यहां तक कहा कि काम सिर्फ औपचारिकता या फोटो खिंचवाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी और सच्ची साधना की तरह होना चाहिए।

जनरल चौहान की फटकार

पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने भी रक्षा उद्योगों को समय पर सैन्य प्रणालियों की आपूर्ति न करने पर कड़ी फटकार लगाई थी। उन्होंने कहा था कि वादा करने के बाद समय पर हथियार न देना अस्वीकार्य है, रक्षा सुधार का रास्ता एकतरफा नहीं हैं। उद्योगों को भी अपनी क्षमताओं के बारे में ईमानदार होना पड़ेगा। आप हमें मझधार में नहीं छोड़ सकते। जब कोई कंपनी अनुबंध करके समय पर सामान नहीं देती, तो सेना की महत्वपूर्ण क्षमता खो जाती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है।

सुधार की कोशिशें

यह सही है कि रक्षा सौदों में मंजूरी और अनुबंध की प्रक्रिया में तेजी आई है, लेकिन इसके बाद डिजाइन, विकास, परीक्षण, प्रमाणन, उत्पादन, इंजन या दूसरे अहम घटकों की आपूर्ति और फिर अंतिम स्वीकृति में लगने वाला समय सैन्य क्षमता को प्रभावित कर रहा है। सरकार ने रक्षा खरीद को सरल बनाने के लिए रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी) और रक्षा खरीद नियमावली (डीपीएम) में बदलाव किए हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर रक्षा मंत्रालय, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, सेनाओं और निजी उद्योगों के बीच तालमेल की कमी एक बाधा बनी है। जब तक खरीद के हर चरण के लिए कड़े समयबद्ध लक्ष्य लागू नहीं किए जाते, तब तक टाइम फैक्टर सैन्य आधुनिकीकरण की कमजोरी बना रहेगा। आने वाले वर्षों में रक्षा खरीद की कसौटी केवल यह नहीं होगी कि कितने हजार करोड़ रुपए के अनुबंध किए गए, असली सवाल यह होगा कि जिस सैन्य क्षमता की जरूरत आज है, वह सैनिकों को मिली कब। रक्षा आधुनिकीकरण का मंत्र आत्मनिर्भरता के साथ समयबद्धता भी होना चाहिए। मेक इन इंडिया के साथ ही लक्ष्य मेक ऑन टाइम भी होना चाहिए।

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