जल्द ही घर बनाना और भी महंगा होने वाला है। खेती के लिए पानी की पाइपलाइन बिछाना या घर की वायरिंग कराना आम आदमी के बजट को बढ़ाने वाला है। सरकार ने सस्ते विदेशी प्लास्टिक कच्चे माल पर नकेल कसने का फैसला किया है। लेकिन इस नीतिगत फैसले का सीधा झटका आम जनता की जेब पर लगने वाला है।
क्या है पूरा मामला?
■ विदेश व्यापार महानिदेशालय ने हाल ही में सस्पेंशन – ग्रेड पॉलीविनाइल क्लोराइड (एस-पीवीसी) रेजिन के आयात नियमों को सख्त कर दिया है। यह एक तरह का प्लास्टिक कच्चा माल है, जिसका इस्तेमाल घरों में इस्तेमाल होने वाले पानी के पाइप, बिजली के तारों की कोटिंग, खिड़कियों की फ्रेम, प्लास्टिक पैकिंग, कई चिकित्सा उत्पादों और यहां तक कि जूतों के सोल बनाने में होता है।
■ विदेश व्यापार महानिदेशालय ने एस- पीवीसी रेजिन पर न्यूनतम आयात मूल्य 0.76 डॉलर (लगभग 64 रुपये) प्रति किलोग्राम या उससे कम कीमत वाले आयात के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया है।
घरेलू कीमतें बढ़ने की आशंका
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि इस कदम से घरेलू पीवीसी रेजिन की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है। भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 1.63 अरब डॉलर का रेजिन आयात किया था। चीन सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता था, इसके बाद जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, इंडोनेशिया, थाइलैंड, अमेरिका, सिंगापुर एवं वियतनाम का स्थान रहा। जीटीआरआई के मुताबिक, इन देशों से आयात की औसत कीमत 0.65 डॉलर से 0.75 डॉलर प्रति किलोग्राम के बीच रही, जो डीजीएफटी की तय राशि 0.76 डॉलर से कम है। ऐसे में मौजूदा आयात का बड़ा हिस्सा अब अंकुश के दायरे में आ जाएगा।
घर से लेकर खेत तक दिखेगा असर
घर बनाने में पीवीसी पाइप, फिटिंग और बिजली के तारों की बड़ी खपत होती है। जब कच्चा माल महंगा होगा, तो कंपनियां इसका बोझ सीधे ग्राहकों पर डालेंगी। खेती- किसानी और पानी की पाइपलाइनों में 70 से 80 फीसदी पीवीसी का इस्तेमाल होता है। पाइप महंगे होने से किसानों का बजट बिगड़ेगा। इस कच्चे माल का इस्तेमाल पैकेजिंग फिल्मों और आम जूतों-चप्पलों में भी होता है, जिससे दैनिक उपयोग की कई वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।
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छोटे उद्योगों के लिए बड़ा खतरा
भारत में पीवीसी पाइप और केवल बनाने वाली हजारों छोटी और मझोली इकाइयां हैं। सस्ता माल न मिलने से उत्पादन लागत बढ़ जाएगी। इसका असर दोतरफा होगा, या तो उत्पाद महंगे होंगे, या फिर कई छोटी इकाइयां बंद होने के कगार पर पहुंच जाएंगी। देश कुल जरूरत का 64 फीसदी एस-पीवीसी रेजिन आयात करता है।




