खोजी रिपोर्ट: डिजिटल अरेस्ट और फर्जी कॉल सेंटर्स का मायाजाल — कैसे आपकी एक चूक खाली कर देती है बैंक अकाउंट
विशेष खोजी रिपोर्ट | azadhindmedia.com इन्वेस्टिगेशन टीम
नई दिल्ली / एनसीआर:
सुबह के 10 बजे हैं। आपके फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आता है। उधर से कड़क आवाज में एक व्यक्ति खुद को सीबीआई (CBI), ट्राई (TRAI) या दिल्ली पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी बताता है। आपको डराया जाता है कि आपके नाम से एक सिम कार्ड जारी हुआ है, जिससे गैर-कानूनी गतिविधियां या मनी लॉन्ड्रिंग हुई है। इसके बाद शुरू होता है ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) का वो मनोवैज्ञानिक खेल, जिसमें एक आम नागरिक अपनी जीवन भर की कमाई मिनटों में गंवा बैठता है।
हमारी विशेष इन्वेस्टिगेशन टीम ने साइबर अपराध के इस फैलते नेटवर्क, कॉल सेंटर्स के काम करने के तरीके और मनी ट्रेल (पैसों के लेन-देन) की पड़ताल की है।
1. डर का मनोविज्ञान: कैसे काम करता है ‘डिजिटल अरेस्ट’?


साइबर अपराधियों का पहला हथियार तकनीक से ज्यादा इंसान का डर है।
नकली सेटअप: साइबर ठग स्क्रीन के उस पार पुलिस स्टेशन या सरकारी दफ्तर जैसा सेटअप तैयार रखते हैं। फर्जी आई-कार्ड और वर्दी दिखाकर सामने वाले को इस कदर डरा दिया जाता है कि वह सोचने-समझने की क्षमता खो बैठता है।
आइसोलेशन (अकेला करना): पीड़ित को हिदायत दी जाती है कि वह किसी से बात न करे और कैमरे के सामने ही रहे। इसे वे ‘डिजिटल अरेस्ट’ का नाम देते हैं।
खाता खाली कराना: इसके बाद ‘जांच’ या ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’ के नाम पर पीड़ित से पैसे अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवा लिए जाते हैं।
2. ‘म्यूल अकाउंट्स’ (Mule Accounts) का जाल: कहाँ जाता है ठगी का पैसा?
हमारी पड़ताल में सामने आया कि ठगी की रकम सीधे मास्टरमाइंड के खाते में नहीं जाती। इसके लिए देश भर में फैले म्यूल अकाउंट्स (किराए के बैंक खातों) का इस्तेमाल होता है।
कौन देता है ये खाते? गांव या छोटे कस्बों के गरीब लोगों, छात्रों या दिहाड़ी मजदूरों को थोड़े से पैसों का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए जाते हैं।
लेयरिंग (Layering): जैसे ही किसी पीड़ित से 5 लाख रुपये ठगे जाते हैं, साइबर ठग उस पैसे को तुरंत 10 से 15 अलग-अलग म्यूल अकाउंट्स में बांट देते हैं।
क्रिप्टो और चाइनीज ऐप कनेक्शन: म्यूल अकाउंट्स से यह पैसा पीयर-टू-पीयर (P2P) ट्रांजैक्शन के जरिए क्रिप्टो-करेंसी (Crypto) में बदला जाता है या विदेश बैठे आकाओं को भेज दिया जाता है।
3. फर्जी सिम और डार्क वेब से डेटा की सेंधमारी
सवाल यह उठता है कि साइबर अपराधियों के पास आपका नाम, आधार नंबर और फोन नंबर कहाँ से आता है?
डार्क वेब (Dark Web) पर बिकता डेटा: ई-कॉमर्स कंपनियों, बैंक इंश्योरेंस या किसी डिलीवरी ऐप से लीक हुआ डेटा डार्क वेब पर कौड़ियों के भाव बिकता है।
बायोमेट्रिक फर्जीवाड़ा: बिना सही सत्यापन के चालू किए गए प्री-एक्टिवेटेड सिम (Pre-activated SIMs) के जरिए ये कॉल किए जाते हैं, जिससे पुलिस के लिए सिम के असली मालिक तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है।
4. पुलिस जांच और चुनौतियां
साइबर विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों से हुई बातचीत के मुताबिक, इस अपराध से निपटने में सबसे बड़ी चुनौती समय (Golden Hour) है।
”अगर पीड़ित ठगी होने के 1 से 2 घंटे के भीतर साइबर हेल्पलाइन (1930) पर शिकायत दर्ज करा देता है, तो पैसों को बैंक लेवल पर होल्ड कराने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन अगर समय ज्यादा बीत जाए, तो पैसा कई परतों में घूमकर निकाल लिया जाता है।” — वरिष्ठ साइबर विशेषज्ञ
बचाव के 4 सबसे अहम कदम (जागरूकता ही सुरक्षा है)
कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई प्रावधान नहीं है: कोई भी सरकारी एजेंसी, पुलिस या सीबीआई वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही पैसे मांगती है।
कॉल तुरंतकाटें: यदि कोई पुलिस अधिकारी बनकर डराए, तो घबराने के बजाय कॉल काटें और नजदीकी थाने में जाकर पुष्टि करें।
अपरिचित लिंक पर क्लिक न करें: एसएमएस या व्हाट्सएप पर आए किसी भी अनजान लिंक या एपीके (APK) फाइल को डाउनलोड न करें।
हेल्पलाइन नंबर याद रखें: साइबर फ्रॉड होते ही तुरंत 1930 पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं।



