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Capf:कैडर अफसरों के मामले की तरह क्या ‘ओपीएस’ केस में भी घिरेगी सरकार, संघ के सशस्त्र बल या सिविलियन फोर्स! – Capf Ops Case: Why The Status Of Armed Forces Could Become Crucial In Supreme Court

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केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में ‘पुरानी पेंशन बहाली’, ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने 2023 में दिए गए अपने फैसले में कहा था कि सीएपीएफ ‘भारत संघ के सशस्त्र बल’ हैं, इसलिए इन्हें ओपीएस के दायरे में लाया जाए। सरकार ने इस फैसले को नहीं माना और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली गई। पूर्व अफसरों का तर्क है कि इस बार पुरानी पेंशन के मामले में सरकार घिर सकती है। वजह, एक तो दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला और दूसरा सरकार ने इसी वर्ष  पारित कराए ‘सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) एक्ट, 2026’ में माना है कि सीएपीएफ ‘संघ के सशस्त्र बल’ हैं। 

सरकार ओपीएस न देने के लिए अड़ती है तो

सीएपीएफ के पूर्व अफसरों का कहना है कि अब सरकार कैसे कह सकती है कि सीएपीएफ तो सिविलियन फोर्स हैं। अगर सरकार ओपीएस न देने के लिए अड़ती है तो संभव है कि कैडर अफसरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए जिस तरह से नया एक्ट लाया गया, उसी तरह सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताने के लिए भी कुछ वैसा ही संशोधन/बिल ले आए। 

पुरानी पेंशन देना ही नहीं चाहती सरकार

बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद कहते हैं कि  सीएपीएफ जवानों और अफसरों के हितों को लेकर सरकार गंभीर नहीं है। वह अपनी मर्जी से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की व्याख्या करती है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन बलों में पुरानी पेंशन लागू करने का फैसला सुनाया तो सरकार ने इन्हें ‘संघ के सशस्त्र बल’ मानने से ही इनकार कर दिया। इससे सरकार की मंशा पता चलती है कि वह केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को पुरानी पेंशन देना ही नहीं चाहती। जब मन करता है तब इन बलों को सिविल फोर्स बता दिया जाता है। ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) एक्ट, 2026’ में लिखा है कि सीएपीएफ ‘संघ के सशस्त्र बल’ हैं। अब सरकार किस तरह मना कर सकती है कि ये बल ‘संघ के सशस्त्र बल नहीं, अपितु सिविलियन फोर्स हैं।

केस हारने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट तक अपील

बीएसएफ के पूर्व अधिकारी आरसी शर्मा कहते हैं कि केंद्र सरकार के पास सीएपीएफ के लिए पेंशन, रैंक रेजिडेंसी पर आधारित एसीपी और बल के कैडर अधिकारियों के लिए ओजीएएस/एनएफएफयू देने के लिए पैसे नहीं हैं। किसानों को एमएसपी देने के लिए पैसे नहीं हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन सरकार कॉरपोरेट्स के कर्ज माफ करने और ‘क्रोनी कैपिटलिज़्म’ (खास लोगों के पक्ष वाले पूंजीवाद) को बढ़ावा देने के लिए तैयार रहती है। केंद्र सरकार, दिल्ली हाईकोर्ट में केस हारने के बाद सुप्रीम कोर्ट तक अपील करती रहती है। सीएपीएफ कैडर अधिकारियों का मामला इसका ताजा उदाहरण है। सुप्रीम कोर्ट ने कैडर अफसरों के हित में फैसला सुनाया, मगर सरकार ने उसे समाप्त करने के लिए और अपनी सर्वोच्चता दिखाते हुए सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) एक्ट ले आई। अब सीएपीएफ में पुरानी पेंशन का केस सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। यहां पर भी सरकार की मंशा, पुरानी पेंशन देने की नहीं है। तभी वह दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में चली गई। 

फोर्स के नियंत्रण का आधार सशस्त्र बल हैं

केंद्र सरकार, सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताती है, जबकि सीएपीएफ पर भारतीय सेना के कानून लागू होते हैं। फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल हैं। इन बलों के लिए जो सर्विस रूल्स तैयार किए गए हैं, उनका आधार भी फौज है। इन सारी बातों के होते हुए भी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को ‘पुरानी पेंशन’ से वंचित किया गया है। एक जनवरी 2004 के बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में भर्ती हुए सभी कर्मियों को पुरानी पेंशन के दायरे से बाहर कर उन्हें ‘एनपीएस’ में शामिल कर दिया गया था। इसी तर्ज पर सरकार ने सीएपीएफ जवानों को सिविल कर्मचारी मानकर उन्हें ओपीएस से बाहर निकालकर एनपीएस में शामिल कर दिया। 

क्या कहता है बीएसएफ एक्ट 1968

सरकार का कहना है कि देश में सेना, नेवी और वायु सेना ही ‘सशस्त्र बल’ हैं। दूसरी तरफ बीएसएफ एक्ट 1968 में कहा गया है कि इस बल का गठन ‘भारत संघ के सशस्त्र बल’ के रूप में हुआ है। इसी तरह सीएपीएफ के बाकी बलों का गठन भी भारत संघ के सशस्त्र बलों के रूप में हुआ है। कोर्ट ने माना है कि ‘सीएपीएफ’ भी भारत के सशस्त्र बलों में शामिल हैं। इस लिहाज से उन पर ‘एनपीएस’ लागू नहीं होता। केंद्रीय गृह मंत्रालय, द्वारा 6 अगस्त 2004 को जारी पत्र में बताया गया है कि गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत केंद्रीय बल, ‘संघ के सशस्त्र बल’ हैं। 

इन बलों में कोर्ट मार्शल का प्रावधान है

सीएपीएफ जवानों को भत्ते भी सशस्त्र बलों की तर्ज पर मिलते हैं। इन बलों में कोर्ट मार्शल का भी प्रावधान है। सीआरपीएफ के पूर्व अधिकारी सर्वेश त्रिपाठी का कहना है कि इस मामले में सरकार दोहरा मापदंड अपना रही है। अगर सीएपीएफ जवानों को सरकार, सिविलियन मानती है तो उनमें आर्मी की तर्ज पर बाकी प्रावधान क्यों हैं। फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल है। जो सर्विस रूल्स हैं, वे भी सैन्य बलों की तर्ज पर बने हैं। अब इन्हें सिविलियन फोर्स बता रहे हैं। ऐसे में ये बल अपनी सर्विस का निष्पादन कैसे करेंगे। इन बलों को शपथ दिलाई गई थी कि इन्हें जल, थल और वायु में जहां भी भेजा जाएगा, ये वहीं पर काम करेंगे। सिविल महकमे के कर्मी तो ऐसी शपथ नहीं लेते हैं।

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